अन्याय का शिकार भारतीय किसान


      गत बीस वर्षों में करीब सवा तीन लाख किसानों ने देश के विभिन्न हिस्सों में आत्महत्या की है, जिनमे मुख्यतः उ.प्र., हरियाणा, म.प्र., पंजाब, महाराष्ट्र राज्यों में अधिकतर आत्महत्या की घटनाएँ हुई हैं. अक्सर बेमौसम वर्षा ,ओला वृष्टि,सूखा के कारण किसानों की फसल चौपट होती रहती है और किसानों के जीवन को प्रभावित करती रहती हैं. सबसे आश्चर्य जनक बात यह है की अनेक पिछड़े राज्यों को छोड़ भी दिया जाय तो भी पंजाब जैसे समृद्ध और सर्वाधिक उपजाऊ भूमि के प्रदेश में भी किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं.जहाँ 2000 से 2010 तक कुल पांच हजार किसानों  ने आत्महत्या की है.

        आत्महत्या करने वाले पीड़ित किसानों से भटिंडा, संगरूर, मनसा,जैसे जिले विशेष रूप से प्रभावित हैं. अन्य गरीब अविकसित,या अपेक्षाकृत कम विकसित प्रदेशों की स्थिति कितनी भयावह होगी इसे सहज ही समझा जा सकता है. विडंबना यह है की एक ओर अन्नदाता आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है अर्थात उसके पास अपने परिवार का पेट भरने के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं है तो दूसरी और प्रति वर्ष हजारों करोड़ रूपए का खाद्यान्न सरकारी गोदामों में सड़ कर नष्ट हो जाता है. खाद्यान्न के रख रखाव और वितरण व्यवस्था में लापरवाही के कारण आज भी देश में बीस करोड़ से अधिक लोगों को दो समय का भोजन सिर्फ सपनों में ही उपलब्ध है अर्थात उन्हें भूखे रहना पड़ता है.

          हमारे देश की विडंबना है की आजादी के सात दशक पश्चात् भी किसानो की समस्याओं का वास्तविक समाधान नहीं निकाला जा सका, ताकि उन्हें अपनी पैदावार का भरपूर लाभ मिल सके.और वह अपने को अन्नदाता बताकर शान से समृद्ध जीवन जी सके. देश को आजादी मिलने के पश्चात् देश की सत्ता पर अनेक राजनैतिक दलों की सरकारें सत्तासीन होती रही,परन्तु किसानों की समस्याओं को गभीरता से न तो समझा गया और न ही उनके जीवन को आसान बनाने के सार्थक  प्रयास किये गए. यद्यपि ऐसा नहीं है की किसानों के हित में कुछ नहीं किया गया ,किसानों और खेती बाड़ी को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक प्रकार की सरकारी छूट प्रदान की गयी जैसे बिजली,पानी, खाद, बीज, कीटनाशक सभी खेती सम्बंधित आवश्यकताओं को रियायती मूल्यों पर उपलब्ध करायी गयीं, कृषि सम्बन्धी सभी उपकरणों को भी विशेष छूट के अंतर्गत रखा गया और तो और एक अकेला खेती बाड़ी ही ऐसा  क्षेत्र है जिससे होने वाली आय को आय कर मुक्त रखा गया, समय समय पर किसानों के कर्ज भी माफ़ किये गए. परन्तु जो भी कदम  किसानों के हित में उठाये गए सभी उपाय अल्पकालिक लाभकारी बन कर रह गए और समय के बदलाव के साथ सभी उपाय नाकाफी सिद्ध हुए.

      जब देश को आजादी प्राप्त हुई थी देश की जी.डी.पी.में कृषि का योगदान 55% था जो वर्तमान में घटकर मात्र 15% ही रह गया है जबकि आबादी बढ़ने के कारण कृषि पर निर्भर लोगों की संख्या 24 करोड़ से बढ़कर 72 करोड़ हो गयी,और खेती की जमीन बंटती गयी. अतः कृषि उत्पादकता में अप्रत्याशित बढ़ोतरी के बावजूद कृषि पर निर्भर रहने वाले लोगों की प्रति व्यक्ति आय घट गयी. बढती बेरोजगारी और अशिक्षा या अल्प शिक्षा के कारण किसानों के पास अन्य कोई रोजगार करने या नौकरी करने की योग्यता भी नहीं है. अतः उन्हें कृषि पर निर्भर रहना उनकी मजबूरी बन जाती है.छोटे किसान के लिए अपनी आजीविका चला पाना कठिन होता जा रहा है.

       कोई भी व्यक्ति यों ही अपनी जीवन लीला को समाप्त नहीं कर देता.कोई न कोई असाधारण मजबूरी ही उसे इस घ्रणित कार्य करने को प्रेरित करती है,जिसे गंभीरता से समझना होगा आखिर वे कौन से कारण बन रहे हैं जो पंजाब जैसे समृद्ध राज्य के किसानों को आत्महत्या करने को मजबूर कर रहा है. सिर्फ फसल ख़राब होने पर ही किसान व्यथित नहीं होता, यदि फसल की बम्पर पैदावार होती है तो भी किसान को लागत मूल्य मिलना संभव नहीं हो पाता, उसे मजबूरी वश अपनी कठिन परिश्रम से उगाई फसल को कौडी के दाम में बेचना पड़ता है. और लाभ व्यापारी या बिचौलिया उठाते हैं. किसानों को अपनी लागत मूल्य के अनुसार उचित कीमत नहीं मिल पाती, जिसके कारण उनकी आर्थिक स्थिति नहीं सुधर पाती और अक्सर घर के विशेष कार्यों जैसे शादी विवाह, बीमारी, मकान की मरम्मत या अन्य कोई मांगलिक कार्यों के लिए खर्चे करने के लिए कर्ज  का सहारा लेने को मजबूर होना पड़ता है.और किसान के लिए यह कर्ज एवं ब्याज चुकाना उसकी जिन्दगी भर के लिए नियति बन जाती है,और परिवार में उधार की अर्थव्यवस्था चलती रहती है.परन्तु स्थिति जब ख़राब होती है जब मौसम की मार के कारण अथवा किसी अन्य कारण से फसल ख़राब हो जाती है.उसके लिए कर्ज की नियमित किश्त चुकाना असम्भव हो जाता है, यदि दुर्भाग्य वश अगले वर्ष भी फसल ख़राब हो जाती है तो कर्ज दार को आश्वस्त करना भी मुशिकल हो जाता है और उसके अत्याचार शुरू हो जाते हैं.यही तनाव असहनीय होने पर किसान को आत्महत्या की मजबूरी तक ले जाता है.

किसान की फसल का विश्लेषण  

  हमारे देश में हर वर्ष सरकार को प्रति वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करना होता है जिस मूल्य पर वह किसानों से खरीद करती है और किसानों को समर्थन मूल्य से नीचे जाकर अपनी पैदावार को नहीं बेचना पड़ता. सरकार द्वारा यह उपाय किसान को व्यापारियों के शोषण से बचाने के लिए किया जाता है. परन्तु सरकार द्वारा निश्चित किया गया समर्थन मूल्य ही किसानों की दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार भी है. सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य ही वर्तमान में प्रचलित मूल्यों के अनुरूप नहीं होते और किसान के साथ न्याय नहीं हो पाता.

      यहाँ पर गेहू का उदाहरण लेकर समझने  का प्रयास करते हैं,1970 में  गेहूं का समर्थन मूल्य 76/-प्रति क्विंटल था और 2015 के समर्थन मूल्य की बात करें तो, 1976 के समर्थन मूल्य का करीब उन्नीस गुना यानि 1450/ प्रति क्विंटल था.  जो बढती महंगाई और बढ़ते लागत मूल्य के अनुसार बिलकुल भी न्याय संगत नहीं बैठता सरकारी क्षेत्र में इस दौरान आम वेतन वृद्धि कम से कम 120 से 150 गुना तक बढ़ाये गए हैं जबकि स्कूल शिक्षक का वेतन तो 280 से 320 गुना तक बढाया गया है. सातवें वेतन योग के अनुसार एक सरकारी चपरासी का वेतन 18000/प्रति माह निर्धारित किया गया है कृषि लागत और मूल्य आयोग के अनुसार(C.A.C.P.) Commission for Agricultural Costs and Pricesगेहूं और चावल पैदावार से किसान को तीन हजार रूपए प्रति हेक्टर की आय होती है जो कम(पांच हेक्टर से कम ) रकबे वाले किसानों के लिए,पंद्रह हजार रूपए की आय वह भी छः माह में किसान के जीवन यापन करने के लिए अप्रयाप्त है,इस प्रकार से उन्हें अपनी मजदूरी भी नसीब नहीं होती.यदि उनकी मजदूरी दस  हजार प्रति माह भी मान ली जाये (यद्यपि सरकारी चपरासी की मासिक आय अट्ठारह माह निर्धारित की गयी है) तो उसे अपनी फसल पर कुल आमदनी साठ हजार होनी चाहिए. जबकि किसान के लिए तो उक्त आमदनी भी संभव नही होती, यदि फसल पर मौसम की मार पड़ जाय. फसल ख़राब हो जाने के पश्चात् छोटे रकबे वाले,एक या दो फसल पर निर्भर किसान के लिए कर्ज चुकाना तो असंभव ही होता है. उत्पादकता की नजर से देखा जाय तो  भारतीय किसान की उत्पादकता अमेरिकी किसान से भी अधिक है, फिर भी भारतीय किसान आत्महत्या कर रहा है.जो यह सिद्ध  करता है की किसान को उसकी पैदावार पर उसके परिश्रम का उचित प्रतिफल नहीं मिल पाता.

     किसानों के साथ सिर्फ अनाज की पैदावार के साथ ही नहीं होता प्याज,आलू,टमाटर,की बम्पर पैदावार और बम्पर खपत वाली फसलों के साथ भी यही हश्र होता है. यदि फसल ख़राब होती  है तो मुनाफा  बिचौलिया खाता है,यदि पैदावार अधिक होती है तो किसान को लागत मूल्य भी नहीं मिलता उसे कौड़ी के दाम फसल को बेचना पड़ता है . प्याज की फसल का उदहारण लिया जाय तो एक एकड़ रकबे में प्याज की खेती के लिए करीब चार किलो बीज की आवश्यकता होती है इस बीज का दाम इस समय 2500/प्रति किलो है अर्थात प्रति एकड़ बीज का खर्च 10000/ और चार माह किसान का श्रम, के अतिरिक्त,सिंचाई,जुताई,बुआई,रसायन इत्यादि मिला कर लगत छः रूपए किलो बैठती है. जिसका थोक भाव आठ से दस रूपए प्रति किलो मिलता है. परन्तु यदि पैदावार बम्पर मात्रा में हो जाय तो किसान को लागत मिल पाना मुश्किल हो जाता है कभी कभी तो लगता है, किसान  को फसल बर्वाद होना इतना कष्टदायक नहीं होता जितना  बम्पर पैदावार होने पर जब उसे लागत मूल्य से भी नीचे अपनी पैदावार को बेचना पड़ता है.

    आजादी के सात दशक पश्चात् यह विदित हो चुका है प्रत्येक सरकार सिर्फ सरकारी कर्मचारियों की हितैषी है.शायद सरकारी कर्मियों के  देश व्यापी प्रभावी संगठनों के दबाव में सरकार को अप्रत्याशित वेतन वृद्धि को मजबूर होना पड़ता है. या  यह कहें की  हमारे देश की राजनैतिक संरचना इस प्रकार की है की जहाँ सरकारी कर्मचारियों के लिए ही सोचा जाता है, देश के अन्य कारोबारी जैसे छोटे दुकानदार,छोटे उद्यमी,छोटे किसान,या स्वयम्भू व्यवसायी के लिए कभी भी कोई कारगर योजना नहीं बनायीं जाती. जबकि सरकारी राजकोष को भरने में इन सबका ही मुख्य योगदान होता है. जब तक वे कारोबार करते हैं लाभ कमाते हैं तो सरकार अनेक प्रकार के टेक्स उनसे बसूलती है परन्तु जब ये विपदा में होते हैं तो सरकार के पास इनके भोजन की व्यवस्था करने के लिए कोई योजना नहीं होती जबकि सरकारी सेवा ने निवृत कर्मचारियों को पेंशन के नाम पर सभी सुख सुविधाएँ जुटा दी जाती है, उन्हें चिकित्सा की विशेष सुविधा अलग से प्राप्त होती है.क्या सरकार का कर्तव्य अपने कर्मचारियों तक ही सीमित है.देश में स्व कारोबरी देश का नागरिक नहीं है या सरकार की जिम्मेदारी उसके कर्मचारियों तक ही सीमित है.जनता से बसूले गए टेक्स पर जनता के सभी वर्गों का सामान रूप से हक़ बनता है. आज देश में हजारो किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं क्यों? क्या वे किसान है यही उनकी त्रुटी है जो किसान अपने अथाह श्रम से जनता का पेट भरता है, वही किसान आत्महत्या करने को मजबूर होता है. क्या यही देश की स्वतंत्रता की वास्तविकता है.

कुछ संभावित उपाय

1.किसानों को अधिक से अधिक शिक्षित करने के उपाय किये जाएँ ताकि वे अपनी फसल उगाने में नयी से नयी तकनीक को इस्तेमाल कर सकें और आवश्यकतानुसार किसी अन्य कार्य या नौकरी का विकल्प भी खोज सकें.

2,कृषि से मिलते जुलते अन्य कार्यों की ओर उन्मुख किया जाय जैसे मुर्गी पालन,मछली पालन,दुग्ध उत्पादन या कृषि उपकरणों के रखरखाव के लिए वर्कशॉप, कृषि उपकरणों का उत्पादन इत्यादि.

3,दो, चार या अधिक गाँव के किसान एक ग्रुप बनाकर स्वयं अपने उत्पाद को सीधे उपभोक्ता को बेचने की व्यवस्था करें ताकि बिचौलियों से बचा जाय और कृषि उत्पादों का अधिक मूल्य मिल सके.

4,किसानों को अपने उत्पाद को खाद्य प्रसंस्करण द्वारा संरक्षित करें और अपने उत्पाद का अधिक लाभ प्राप्त कर सकें जैसे टमाटर उत्पादक यदि स्वयम  टोमेटो सौस या प्यूरी बनाये तो उन्हें और उनके साथी किसानों को फसल का अधिक मूल्य मिल सकता है. आलू के चिप्स बनाने के प्लांट अपने गाँव में ही लगाये. जैसे गन्ने से गुड प्रत्येक गाँव में ही बनता है.और किसान के लिए विकल्प खुला होता है की वह गन्ना मिलों को दे या गुड उत्पादक इकाइयों को.

5, मनरेगा (MNREGA MEANS “Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act”) जैसी सरकारी योजनायें भी कारगर हो सकती हैं यदि उसमे व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त कर दिया जाय.इस योजना में पारदर्शिता लायी जाय.

       आज स्थिति यह हो गयी है जो वर्ग संगठित है अपनी आवाज को जोरदार ढंग से बुलंद कर सकता है,धनवान है ,बलशाली है या प्रभाव शाली है उसकी ही सुनवाई होती है उसके लिए ही सरकार अपनी नीतियाँ बनाती आई है.परिणाम स्वरूप एक गरीब किसान हो या छोटा व्यापारी या छोटा उद्यमी अथवा अन्य कोई कारोबारी वह सिर्फ सरकार के खजाने को भरने के लिए पैदा हुआ है सुविधा के नाम पर उसे आत्महत्या ही मिलती है. कारोबारी हो या किसान वे अपने कार्यकाल के दौरान होने वाले घाटे के समय उसकी जीविका की कोई व्यवस्था नहीं हो पाती, कार्यकाल के पश्चात् तो पेंशन के लिए सोचना तो उनके लिए दिवास्वप्न के समान है.


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