अपराधिक राजनीतिकरण


                  आज विश्व भर में मानव मात्र के कल्याण के लिए किसी भी देश की शासन व्यवस्था के लिए लोकतान्त्रिक सरकार(जनता द्वारा चुनी हुई सरकार) का गठन सर्वोत्तम शासन प्रणाली माना जाता है. परंपरागत राजशाही अथवा तानशाही के राज को नकार दिया गया है. जनता द्वारा चुनी सरकार को ही समय का तकाजा माना जाता है.इसी प्रणाली को किसी भी देश में सामाजिक न्याय, सामाजिक समरसता एवं सर्वांगीण विकास के अवसर के रूप में देखा जाता है. अतः हमारे संविधान निर्माताओं ने समय की मांग के अनुसार और देश की जनता के कल्याण के लिए एक गणतंत्र राष्ट्र की व्यवस्था की और उसको दिशा निर्देशों से नियमबद्ध करने के लिए लिखित संविधान का निर्माण किया और इस प्रकार हमारा देश एक गणतंत्र राष्ट्र बन गया. यहाँ जनता द्वारा जनता के कल्याण के लिए,जनता की आकाँक्षाओं के अनुरूप कार्यों को अंजाम देने के लिए उपयुक्त सरकार चुनी जाती है.यद्यपि किसी भी देश में लोकतंत्र की सफलता के लिए जनता का शिक्षित होना और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक एवं जिम्मेदार होना भी आवश्यक है.दुर्भाग्यवश आजादी के तुरंत पश्चात् हमारे देश की जनता में शिक्षा का नितांत अभाव था,शिक्षा के अभाव में चुनाव की जिम्मेदारी को निभा पाना अप्रासंगिक था.जनता की इसी कमजोरी का भरपूर लाभ तत्कालीन नेताओं ने उठाया और देश को अपेक्षित विकास पथ पर न ले जाया सका.

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लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं के अनुसार हमारे यहाँ भी जनता के मतों द्वारा सरकार के प्रतिनिधियों का चुनाव किया जाता है.एक नियत अवधि के बाद पुनः चुनाव प्रक्रिया द्वारा जनता के आदेश के अनुसार नयी सरकार का चुनाव किया जाता है. चुनाव प्रक्रिया द्वारा किसी भी पार्टी को सत्तारूढ़ होने के लिए समाज के सभी वर्गों का समर्थन प्राप्त करना आवश्यक हो जाता है. व्यापक समर्थन मिलने के पश्चात् ही कोई भी पार्टी सरकार बनाने लायक आवश्यक समर्थन जुटा सकती है. हमारे देश की जनता आजादी के समय अधिकतर अशिक्षित थी उसे यह भी समझ नहीं थी की वोट डालने का क्या मतलब होता है.सदियों से विदेशी शासन में रहने की आदि हो चुकी जनता को कोई भी थोड़े से बाहुबल से आसानी प्रभावित कर सकता था. अतः दबंगों ने जनता की इस कमजोरी का लाभ उठाकर, जनमत को अपने आका के हक़ में कर शासन पर अपनी पकड़ बना ली, यदि कोई व्यक्ति दबंग के काबू में नहीं आ पाता था तो उसे बहला फुसला कर कुछ प्रलोभन जैसे दारू अथवा कुछ धन का लालच देकर वोट अपने पक्ष में डलवा लेते थे और चुनाव जीत जाते थे. जब कुछ नेता दबंगों का सहारा लेकर जीतने लगे तो अन्य प्रत्याशियों ने भी यही फ़ॉर्मूला अपनाया.इस प्रकार चुनावों की बेला में दबंगों, अपराधियों की चांदी होने लगी और सत्ता में अपनी पकड़ बना लेने के कारण अपनी अपराधिक गतिविधियों को निर्भय होकर करने लगे. ये अपराधी या दबंग लोग ही आगे चल कर स्वयं भी चुनाव प्रक्रिया द्वारा चुनाव जीत लेने का दंभ भरने लगे और जीतने भी लगे.धीरे धीरे सदन के पटल पर अनेक अपराधी दिखाई देने लगे.कभी कभी तो जाने माने डकैत भी चुनाव जीत कर विधायिका का हिस्सा बन गए.फूलन देवी का नाम भी उल्लेखनीय है जो डकैत होते हुए भी चुनाव जीत कर सांसद बन गयी और जनता ने उसे जिताया यह भी आश्चर्यजनक विषय है. इसी प्रकार अनेक माफिया चुनाव जीत कर सरकार का हिस्सा बनने लगे. इससे प्रतीत होता है की हमारे देश की जनता को फुसलाना, बरगलाना, धमकाना किस हद तक संभव है.एक अपराधिक प्रवृति का व्यक्ति चुनाव लड़ता है तो चुनाव आयुक्त कुछ भी नहीं कर पाता.क्योंकि हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था के अनुसार जब तक किसी व्यक्ति को अदालत द्वारा अपराधी साबित न कर दिया जाय, उसे अपराधी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.यही कारण है की जब कोई भी उम्मीदवार अनेक अपराधों में लिप्त पाया जाता है और अदालतों में उस पर अनेक केस चल रहे होते हैं तो भी वे चुनाव जीत कर माननीय हो जाते हैं और बाद में मंत्री के पद को भी सुशोभित कर लेते हैं. अदालत के नियमों के अनुसार जब तक किसी व्यक्ति पर दोष सिद्ध नही हो जाता उसे अपराधी नहीं माना जा सकता, और वह चुनाव लड़ सकता है.अदालत के इसी सिद्धांत के कारण अनेक पेशेवर अपराधी भी मंत्री पद तक पहुँच जाते हैं.जब एक अपराधी मंत्री बन जायेगा तो वह कानून भी अपने हितों को ध्यान में रख कर ही बनाएगा और कुछ खामिया छोड़ देगा ताकि वह बाद में भी अपने अपराधिक कार्यों को अंजाम दे सके और उसका कुछ भी न बिगड़ पाए.
यह हमारे चुनाव प्रक्रिया की कमी है की चुनाव लड़ने के लिए कोई भी शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं है और न ही मंत्री बनने के लिए किसी विशेष योग्यता का प्रावधान है.जबकि देश के शासन में एक चपरासी की नियुक्ति के लिए भी न्यूनतम योग्यता का प्रावधान होता है. यद्यपि संविधान निर्माण के समय अधिकतर जनता के शिक्षित न होने के कारण जनप्रतिनिधियों की न्यूनतम योग्यता निर्धारित करना प्रासंगिक नहीं था,उचित नहीं था.परन्तु आज स्थिति पूर्ववत नहीं है.आज देश में साक्षरता का प्रतिशत काफी बढ़ चुका है,अतः अब कुशल प्रशासनिक क्षमता के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित करना आवश्यक हो गया है.
यदि कोई व्यक्ति मंत्रालय के क्रियाकलापों से अनभिज्ञ होता है, वह मंत्रालय का बॉस बन जाता है (यद्यपि मंत्रालय में अनेक विशेषज्ञ होते हैं) तो बेसिक जानकारी बॉस को भी होनी चाहिए तब ही वह अपने अधिकारियों की बातें समझ सकता है. उसकी बारीकियों को जान सकता है और सभी पर सुचारू रूप से नियंत्रण कर सकता है.यदि वह मंत्री पहले अपराधी रहा है तो समझा जा सकता है उसके निर्णय कितने कल्याणकारी हो सकते है और कितने देश और देश की जनता के लिए कितना हितकरी हो सकते हैं.राजनीति में अपराधियों के आ जाने से कोई भी योग्य एवं भद्र पुरुष राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहता.जब योग्य व्यक्ति सत्ता से बहार रहेंगे और अपराधी अथवा दबंग लोग सत्ता को संभालेंगे तो देश का बेडा गर्क तो होना ही है.इसीलिए आज देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था एक मजाक बन कर रह गयी है.
कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने आवश्यक हैं.प्रत्येक विधायक,सांसद या पार्षद के प्रत्याशी के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित की जाय, तत्पश्चात जो जनप्रतिनिधि सरकार के हिस्सा बनते हैं अर्थात मंत्री, मुख्य मंत्री, अथवा प्रधान मंत्री उनकी शैक्षिक योग्यता उनके कार्यभार के अनुरूप निर्धारित की जाय.एक अन्य महत्व पूर्ण कदम के तौर पर जनता को उसके वोट की कीमत का ज्ञान कराया जाय,सत्ता में उसकी भागीदारी का महत्व समझाया जाय की चुनाव प्रक्रिया में उसकी लापरवाही या अवहेलना.लालच करना स्वयं उसके भविष्य के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है.अन्यथा देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था से जनता को कोई भी लाभ मिलने वाला नहीं है,पहले विदेशी जनता का शोषण करते थे अब देसी नेता जनता को लूटते रहेंगे और उसका शोषण करते रहेंगे.(SA-188C) .

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