चक्र व्यूह में फंसा भारतीय लोकतंत्र (अंतिम भाग)


चुनाव पद्धति में खामिया;  

गत दिनों बिहार में ऐसे घुर विरोधी दल महागठबंधन में शामिल हो गए जो कभी स्पष्ट रूप से एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हुआ करते थे, सिर्फ इसलिए ताकि भा.ज पा सत्ता में न आ जाये.क्योंकि आज नेताओं के कोई सिद्धांत बाकी  नहीं रह गए हैं उन्हें सिर्फ सत्ता चाहिए. उनकी रणनीति कारगर साबित हुई और परस्पर विरोधी सिद्धांतों के दल (आर.जे.डी.और जे. डी.यू.) एक साथ सत्ता के भागी दार बन गए. यहाँ पर यह कहना भी अनुचित न होगा कही न कही हमारी चुनावी प्रक्रिया में खामिया भी है, जिसके कारण मात्र २५% प्रतिशत जनता के वोट प्राप्त कर कोई भी दल या उम्मीदवार सत्ता पर काबिज हो जाता है,कहने का तात्पर्य है की सत्ताधारी  दल जनता के बहुमत से जीता हुआ नहीं होता बल्कि जनता उसके विरोध में अधिक होती है. क्योंकि उसके मत विभिन्न दलों में बंटें हुए होते है और जिसे अधिक मत मिलता है वह जीत जाता है, न की कुल मतदाताओं के बहुमत से.इस प्रकार से अधिकतर चुनाव की जीत वास्तविक जनता की इच्छा को परिलक्षित नहीं कर पाती. यही वजह थी बिहार में एक हो गए तमाम विरोधी पार्टियों के गठबंधन को जीत प्राप्त हो गयी और सभी  दलों से अधिक मत पाने वाली भा.ज पा सत्ता से बाहर रह गयी.एक प्रकार से कहा जा सकता है हमारे देश में अभी सच्चे लोकतंत्र का अभाव रहा है जो जनता की वास्तविक भावनाओं को परिलक्षित कर सके और अधिकतर जीतने वाला प्रतिनिधि जनता के बहुमत का प्रतिनिधित्व नहीं करता,चुनाव में आधे से अधिक मत उसके विरोध में पड़ते है अर्थात किसी अन्य  उम्मीदवार को मिले होते हैं.इस प्रकार आजादी के पश्चात् से अक्सर बहुमत में जनता का मत विरोध में पड़ने के बाद भी कांग्रेस के  उम्मीदवार जीतते रहे और कांग्रेस को सत्ता प्राप्त होती रही क्योंकि जनता के वोट अनेक दलों में बाँट कर महत्वहीन हो जाते रहे हैं. अतः हमारी चुनावी पद्धति में खामियों के कारण हमारी चुनी हुई सरकार जनता का वास्तव में प्रतिनिधित्व नहीं करती, और सरकार जन  भावना के अनुरूप कार्य नहीं करतीं. अतः यह भी आवश्यक है हमें अपनी चुनाव प्रक्रिया में इस प्रकार से बदलाव करें ताकि जीतने वाले उम्मीदवार को कुल मत दाताओं के आधे से अधिक मतदाताओं का समर्थन प्राप्त हो तब ही वह जीत का हक़दार बने.सही मायने में वही जनता का वास्तविक प्रतिनिधि होगा और जन आकाँक्षाओं के अनुरूप कार्य कर सकेगा,जन कल्याण की बात सोच सकेगा.

जनता की गाढ़ी कमाई की लूट;

कुछ दिनों पूर्व ही  सातवे वेतन योग की रिपोर्ट आयी थी, जिसमें हर बार की भांति इस बार भी सरकारी कर्मचारियों को दिल खोलकर वेतन वृद्धि का तोहफा दिया गया है,साथ ही पेंशनर्स को भी भरपूर बिना कुछ किये घर बैठे भारी राशी उपलब्ध करायी जा रही है,नित्य नए नए फ़ॉर्मूले अपना कर उन्हें धन लाभ उपलब्ध कराया जा रहा है इस सबका बोझ सीधे सीधे जनता पर पड़ता है,उस पर अनाप शनाप टेक्स का बोझ डालकर वसूल किया जाता है और उससे वसूले गए टेक्स से प्राप्त राजस्व को अपने कर्मचारियों के वेतन पर खुलकर.असंगत तरीके से खर्च कर दिया जाता है. पेंशनर्स को पेंशन देने का अभिप्राय था उनका शेष जीवन का भरण पोषण, बिना कष्ट के चलता रहे,और यह तर्क संगत भी है, की सरकारी सेवा से निवृत कर्मचारियों के भरण पोषण की व्यवस्था की जाय.परन्तु पेंशन का अर्थ उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं तक सीमित होना चाहिए था,जनता से वसूले गए टेक्स से उनकी सभी इच्छाओं की व्यवस्था करना जनता के साथ अन्याय है.इसके अतिरिक्त सरकार की जिम्मेदारी जनता के अन्य वर्ग के प्रति भी है विशेष तौर से जो अपने कार्यकाल में  सरकारी खजाने को भरने में अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करते हैं,जैसे व्यापारी,व्यवसायी या निजी कारोबारी.उन्हें भी कभी कभी बुरे समय(व्यक्तिगत दुर्घटना,व्यावसायिक स्थल पर आगजनी,चोरी डकैती,हेरा फेरी,रंगदारी,अपहरण,संतान से बैर या उसका दुर्व्यवहार इत्यादि) का सामना करना पड़ता है जब उन्हें भरण पोषण करने लायक भी साधन नहीं होते. क्या सरकार के खजाने को भरने में सहयोग करने वालों को उनके बुरे समय में जीवन चलाने के लिए पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार नहीं है.इसी प्रकार आज भी करोड़ों की संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो गरीबी रेखा से जीवन को जीने को मजबूर हैं,जिन्हें दो समय का भोजन भी उपलब्ध नहीं हो पाता,क्या सरकार का उनके प्रति कोई कर्तव्य नहीं बनता,ताकि वे भी इन्सान की जिन्दगी जी सकें.समाज वाद और समानता का अधिकार सिर्फ सरकारी कर्मियों तक ही सीमित है.क्या जनता से प्राप्त टेक्स को सरकारी कर्मचारियों में बाँटने का ही सरकार का कर्तव्य है? जनता द्वारा भारी मात्रा में  टैक्स देने के बाद भी विकास कार्य नहीं हो पाते, क्योंकि उसके  टेक्स से प्राप्त राजस्व का बहुत बड़ा भाग सरकारी कर्मियों के बेतहाशा बढे वेतन और पेंशन में चला जाता है और वर्तमान व्यवस्था के अनुसार आगे भी जाता रहेगा.

यह बात मानी जा सकती है की सरकारी कर्मी को आम तौर में बाजार के वेतन मानों से अधिक वेतन दिया जाय ताकि उनमें जनहित के कार्य करने की इच्छा बनी रहे.परन्तु बाजार में प्रचलित वेतन मान से अनेक गुना वेतन देना, किसी भी प्रकार से देश के हित में नहीं माना जा सकता.एक आम स्कूल अध्यापक का वेतन वर्तमान जीवन शैली,और प्रचलित मूल्यों के अनुसार पंद्रह हजार आम तौर से स्वीकार्य है, जबकि बेरोजगारी के कारण आज भी तीन हजार से पांच हजार तक प्रति माह में अनेक युवा कार्य करने को तैयार रहते हैं और निजी स्कूलों में कार्यरत भी हैं. परन्तु सरकारी अध्यापकों को उसी श्रेणी में पैतीस से चालीस हजार मिलते हैं, जबकि वे कार्य के नाम पर सिर्फ उपस्थिति दर्ज करने में अपनी रूचि रखते हैं, सरकारी स्कूलों में पढने वाले बच्चों की प्रतिभा का आंकलन कर ज्ञात किया जा सकता है,की वे क्या पढ़ रहे हैं.सरकारी स्कूलों के कितने बच्चे वर्तमान प्रतिस्पर्द्धा को झेल पाते हैं. यही कारण है सरकारी अध्यापक भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढाना उचित मानते हैं.आखिर क्यों, ऐसे अध्यापको को इतना अधिक वेतन उपलब्ध कराया जाय,जो सिर्फ जनता के धन की बर्बादी है.

इसी प्रकार से अन्य पदों पर विराजमान अन्य सरकारी कर्मियों के वेतन का भी यही हाल  है.एक अन्य उदाहरण के तौर पर एक साधारण क्लर्क जो पंद्रह हजार में उपलब्ध हो सकता है, सरकार उन्हें चालीस हजार से साठ हजार तक वेतन उपलब्ध कराती है और आगे भी नियमित बढ़त जारी रहती है. सरकारी इंजिनियर जो टेक्नीकल ज्ञान के लिए नियुक्त किये जाते हैं परन्तु उनकी रूचि सिर्फ टेंडर पास करने और माल खरीदने में ही रहती है, ताकि उनकी अतिरिक्त आमदनी की  सम्भावना हो सके. आधे से अधिक इंजिनियर तो तकनिकी ज्ञान  भूल भी चुके होते हैं और अपने अंतर्गत छोटे कर्मचारियों पर पूरी तरह से निर्भर रहते हैं, परन्तु उन्हें वेतनमान  निजी कम्पनी में कार्य करने वाले इंजिनियर से भी अधिक उपलब्ध कराया जाता है और उनका भविष्य भी पूर्णतया सुरक्षित होता है. आज बढ़ते वेतनमान और सेवा शर्तों के कारण सरकारी कर्मी काफी महंगा पड़ता है,इसीलिए सभी सरकारी विभाग अपने कार्यों को निजी संस्थाओं से कराना लाभप्रद मानते हैं और अपने अधिकतर कार्य निजी ठेकेदारों से कार्य करा रहे हैं.सरकारी विभागों में पदों की संख्या भी घटाई जा रही है,यह इस बात सबूत है की वे प्राप्त कर रहे वेतनमान के अनुरूप उत्पादक सिद्ध नहीं होते,और विभाग के लिए बोझ साबित हो रहे हैं.

रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु ने एक सक्षात्कार में सी.एन.बी.सी.आवाज को बताया की सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के पश्चात् रेल मंत्रालय पर प्रतिवर्ष बत्तीस  हजार करोड़(32,000crore) रूपए का अतिरिक्त भार पड़ेगा. जिसे वहन करना रेल विभाग के लिए चुनौती बन जायेगा. क्योंकि रेल विभाग पहले से ही वित्तीय संकट से जूझ रहा है, साथ ही उस पर सुरक्षा एवं अनेक प्रकार के सुधारों की अपेक्षाओं को पूरा करने की चुनौती है. आगे से यात्री किराया बढ़ाना या माल भाडा बढ़ाना भी आसान नहीं होगा.

असीमित वेतन वृद्धि का कारण वेतन आयोग है, जिसे हर दस वर्ष बाद वेतन पुनः निर्धारित करने के लिए नियुक्त किया जाता है और जिसके सदस्य सरकारी अधिकारी(नौकर शाह) ही होते हैं, अतः उनके  निर्णय तो सरकारी कर्मियों के पक्ष में होना स्वाभाविक है,अब जब उसकी सिफारिशों को सरकार द्वारा  पास करने की बात आती  है, तो सरकार में बैठे नेताओं की मजबूरी है की उन्हें जिनसे कार्य कराना है उनकी मांगों को माना जाय अन्यथा उनसे वैध और अवैध कार्य कैसे कराये जा सकेंगे और फिर उनकी कौन सा जेब से कुछ खर्च हो रहा है जनता का पैसा है खर्च होने दो. राजनेताओं पर वेतन आयोग की बातें मानने का एक कारण यह भी है की उन्हें विभिन्न सरकारी कर्मचारी संगठनों के आंदोलित हो जाने का खतरा भी होता है.यदि सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर जाते हैं तो जनता परेशान  होती है, जो सत्तारूढ़ पार्टी के लिए नुकसान दायक होता है,और विरोधी पार्टियाँ उसका लाभ उठाती हैं. आज हालत यह हो चुकी है केंद्र सरकार के खाते में विभिन्न टेक्सों से आने वाला कुल राजस्व नौ लाख करोड़ के लगभग है, और वर्तमान सातवें वेतन योग की सिफारिशों को लागू करने के पश्चात् सरकारी कर्मचारियों के वेतन,और पेशन धारियों की पेंशन पर पांच लाख करोड़ से भी अधिक खर्च करना होगा. जनता से जो टेक्स वसूला जाता है वह जन कल्याण और जनहित के कार्यों के लिए होता है, जब सरकार आधे से अधिक राजस्व अपने स्टाफ पर ही खर्च कर देगी तो विकास कार्यों के लिए धन कहाँ से आयेगा और जिस प्रकार से भ्रष्टाचार द्वारा सरकारी कार्य होते हैं, तो शेष धन भी जनता के लिए कितना लाभदायक हो पायेगा. जबकि अन्य देशों के मुकाबले भारत की जनता को सर्वाधिक टेक्स का भुगतान करना पड़ता है,वह भी सुविधा रहित.

राज्य सरकारों का भी दिवाला निकला;

जब केंद्र सरकार के कर्मचारियों के वेतन बढ़ते हैं तो बाद में प्रदेश की सरकारों भी अपने कर्मियों के वेतनमान बढाने पड़ते हैं,जो उनके सीमित साधनों के रहते उनके लिए इतने भारी वेतनमानों के बोझ को उठा पाना उनकी अर्थव्यवस्था को अस्तव्यस्त कर देता है,कुछ राज्यों के पास तो वेतन देने लायक राजस्व ही नहीं होता और उन्हें भुगतान करने के लिए केंद्र सरकार पर निर्भर होना पड़ता है.जब सरकार के पास धन ही नहीं बचेगा का तो वह जनता के लिए क्या करेगी?

वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष के अनुसार अधिकतर राजनेता और राजनैतिक पार्टियों के लिए न तो लोकतंत्र महत्वपूर्ण है और न ही उन्हें देश या देश की जनता के कल्याण की चिंता है. उन्हें सिर्फ सत्ता का सुख चाहिए, उसे पाने के लिए वे नैतिक और अनैतिक आचरणों की भी परवाह नहीं करते.इसी कारण देश को ऐसे भंवर में फंसा दिया है जिससे निकलना आसान नहीं होगा.सहिष्णुता से उनका कोई नाता नहीं है न ही वे धर्म निरपेक्षता में विश्वास करते हैं. वे अपनी सुविधा के अनुसार सहिष्णुता और धर्म निरपेक्षता को परिभाषित करते हैं और दिखावटी तौर पर धर्मनिरपेक्षता व्यक्त करते हैं. यही विडंबना है आज के भारतीय लोकतंत्र की,जो ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुका है,जिससे निकल पाना हाल फिलहाल संभव नहीं दीखता.यदि सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाम लग सकी तो हालात बेहतर हो सकते हैं.

 


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s