व्यवसायी एवं व्यापारी को भी चाहिए आर्थिक सुरक्षा कवच


 

जब कोई जीव दुनिया में जन्म लेता है तो उसे निर्बाध रूप से आवश्यकतानुसार भरपेट भोजन की आवश्यकता होती है.अतः खाद्य सुरक्षा किसी भी जीव के लिए सर्वाधिक आवश्यक तत्व है, बाकी  सभी आवश्यकताएं उसके बाद ही आती हैं. मानव इस सृष्टि की सर्वश्रष्ठ रचना है,उसकी जीवन शैली भी सभी जीवों से हटकर है,इसी कारण उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं में रोटी, कपडा, और मकान आता है. अतः कोई भी व्यक्ति जीवन पर्यंत इन आवश्यकताओं की पूर्ती के बिना नहीं रह सकता. यहाँ पर यह कहना अनुचित न होगा की हमारे देश का पारिवारिक ढांचा ऐसा है की परिवार अपने परिजन के दुःख दर्द में सदैव साथ खड़ा रहता है.परन्तु जिस प्रकार से परिवार विभक्त होते जा रहे हैं,आधुनिकता की दौड़ में आज प्रत्येक व्यक्ति अपनी लडाई स्वयं लड़ने को मजबूर हो रहा है,अतः आर्थिक साधन जुटाने की जिम्मेदारी एकाकी परिवार के मुखिया की होकर रह जाती है. समाज में इसके अतिरिक्त अपवाद भी बहुत होते हैं,जब एक व्यक्ति किसी कारण वश निसहाय हो जाता है,और उसका  सम्मान दांव पर लग जाता है, उसके लिये  दो समय का भोजन जुटाना भी मुश्किल हो जाता है. अतः एक सभ्य और विकसित देश के शासक के लिए आवश्यक है की वह अपने देश के सभी नागरिकों के लिए जीवन भर न्यूनतम आवश्यकताओं की अपूर्ती सुनिश्चित करे. सरकार के लिए  यह दायित्व जब तो और महत्त्व पूर्ण  हो जाता है,जब कोई नागरिक देश के विकास में योगदान करता है, या करता रहा है .उसके बुरे समय में सरकार उसके भरण पोषण की जम्मेदारी उठाकर उसका सम्मान बनाये रखे.

स्वतन्त्र भारत की सरकारों ने समय समय पर देश और देश की जनता के विकास के लिए अनेक उपाय किये, इंडस्ट्री ,खेती बाड़ी, रोजगार,समाज की मूल अवश्यक्ताओं की पूर्ती इत्यादि के उत्थान के लिए अनेक योजनायें बनायीं गयी,जिनके लाभ भी जनता को मिले, परन्तु भ्रष्टाचार के कारण जनता तक यथावत नहीं पहुँच पाए,फिर भी जो कुछ भी जनता तक पहुंचा, उसी के साथ जनता ने अपने अथाह परिश्रम से देश के विकास को गति प्रदान की और सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार के होते हुए भी अपने जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में सफलता पाई. अनेक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार उच्च माध्यम वर्ग तक पहुँचने में कामयाब हुए तो मध्यम वर्गीय परिवार अधिक सम्रद्ध हुए. मजदूर व्यक्ति जिसे अंतिम व्यक्ति भी कहा जाता है उसका जीवन स्तर भी बढ़ा है,उसे अनेक अतिरिक्त सुविधाएँ उपलब्ध हो सकीं.

गत छः दशक में सभी दलों की सरकारों ने देश का शासन संभाला है,सभी ने सरकारी कर्मियों के कल्याण के लिए विभिन्न योजनायें बनायीं, समय समय पर नियुक्त वेतन आयोग सरकारी कर्मियों के  वेतन मान बढ़ने की निरंतर सिफारिश करते  रहे है और जिसे हमारे नेताओं ने सहर्ष स्वीकार किया. परिणाम स्वरूप सरकारी विभागों में वेतनमान देश में प्रचलित वेतनमानों से कई गुना अधिक हो गए,और सिर्फ वेतनमान ही नहीं उसके लिए अनेक प्रकार की चिकित्सा सुविधाएँ और सेवा निवृति के पश्चात् मोटी पेंशन की व्यवस्था कर दी गयी और सरकारी राजस्व का बहुत बड़ा भाग कर्मचारियों के वेतन पर खर्च होने लगा. देश के विकास के नाम पर जनता से जुटाया गया टेक्स सरकारी कर्मियों के कल्याण पर खर्च किया जाने लगा. जिससे देश के विकास को प्रभावित तो होना ही था,देश की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया है,परन्तु नेताओं को अपने कर्मियों को खुश रखना मजबूरी है.अन्यथा उनके लिए काम काज करना कष्टप्रद हो जाता,और भ्रष्टाचार कर पाने,और अपनी तिजोरियां भरने में भी मुश्किलें आतीं. दूसरी ओर इसमें उनके जेब का कुछ खर्च नहीं होता, जनता से बसूले गए टेक्स को देने में कोई उन्हें क्या आपत्ति हो सकती है? सोचने का विषय यह है की क्या सरकार या सत्ता धारी नेताओं का दायित्व सरकारी कर्मियों के कल्याण का ही है.क्या अन्य व्यवसायी,व्यापारी सरकारी सेवा नहीं करते? वे भी जनता से टेक्स वसूल कर सरकारी खजाने में जमा करने का कार्य करते हैं और स्वयं भी कानून के अनुसार अनेक प्रकार के टेक्स देते हैं.  क्या उनका कोई हक़ नहीं बनता की वे कम से कम अपने बुरे समय में सरकार से किसी प्रकार का सहयोग पा सकें और एक सुरक्षित जीवन की कल्पना कर सकें. उस समय जब कोई व्यक्ति(निजी व्यवसायी) किसी प्रकार की अक्षमता के चलते कार्य नहीं कर पाता या वृद्ध शरीर के कारण अपने भरण पोषण के लिए आर्थिक साधन नहीं जुटा पाता,तब भारत का नागरिक होने के नाते वह न्यूनतम स्तर पर भी भरण पोषण की व्यवस्था का हक़दार नहीं होता? जो व्यक्ति बीमा कराते हैं उन्हें भी मरणोपरांत ही बीमित धन राशी मिलती है,और मात्र बीमित राशी से परिवार की भावी आवश्यकताओं की पूर्ती होने संभव नहीं होता,महंगाई के समक्ष बड़ी से बड़ी बचत राशी अपर्याप्त हो जाती है.

आज भी सरकारी खजाने की आय का मुख्य स्रोत व्यवसायी वर्ग एवं व्यापारी, या उद्योगपति है. परन्तु जो सरकारी खजाने को भरने का मुख्य कारक है,उसे अपने समस्त कार्यों को,प्रारंभ करने या संचालित,करने के लिए अनेक प्रकार की सरकारी अनुमति लेने के लिए सरकारी कर्मियों को भेंट भी चढ़ानी पड़ती है, जिसके बिना उसका कोई कार्य नहीं होता.अर्थात सरकारी खजाने को भरने के अतिरिक्त सरकारी कर्मियों की भरपूर सेवा इसी वर्ग के माध्यम से होती है. परन्तु यही वर्ग सर्वाधिक उपेक्षित है, उसके कल्याण के लिए कोई भी योजना सरकार ने नहीं बनायीं. जैसे यह वर्ग सिर्फ टेक्स एकत्र कर देने के लिए बना है, या वह सिर्फ कर दाता ही है. आजाद देश की सरकार से कोई सुविधा पाने का अधिकारी नहीं है. शायद वह आजाद देश का नागरिक है ही नहीं, वह आज भी गुलाम है. विदेशी हुकूमत की भांति टेक्स भरने के लिए है, साथ ही पहले की भांति(गुलाम देश के समय) सरकारी विभागों द्वारा शोषण का भी सर्वाधिक शिकार होता है.सभी उसे कामधेनु गाय समझ कर उसका दूध निकालने का प्रयास करते हैं.

व्यापारी वर्ग हो या उद्योगपति अथवा अन्य निजी व्यवसायी सभी अनेक प्रकार के जोखिमों से जूझते रहते है तब कही अपने लिए जीविका की व्यवस्था कर पाते हैं.जब वे कमाते हैं तो अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों को सरकार को अदा करते हैं. ट्रैड टैक्स,रोड टेक्स,कस्टम ड्यूटी,एक्सायीस ड्यूटी,सर्विस टैक्स,मनोरंजन कर के रूप में सरकारी राजस्व निजी व्यवसायी से ही प्राप्त होता है अर्थात यह राजस्व निजी व्यवसायी के माध्यम से ही सरकार को प्राप्त होते हैं. अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी राजस्व को एकत्र करने की जिम्मेदारी निजी व्यवसायी द्वारा उठाई जाती है.जब निजी व्यापार,उद्योग,चलता है तभी राजस्व उत्पन्न होता है,साथ ही लाखों.करोड़ों लोगों को रोजगार भी प्राप्त होता है. इसके अतिरिक्त अपने कारोबार से अर्जित लाभ पर इनकम टेक्स भी अदा करते है.जिससे सरकार के सभी खर्च पूरे होते हैं देश के विकास,देश की रक्षा खर्च, जनसुविधाएँ के लिए होने वाले खर्च, व्यापारियों या निजी व्यसायियों द्वारा अनेक प्रकार के टेक्स एकत्र कर एवं अदा कर  जुटाए जाते हैं.

सरकारी क्षेत्र के उद्योग अपने एकाधिकार के होते हुए भी घाटे में चलते हैं,और निजी क्षेत्र के उद्योग उन्ही परिस्थितियों में रहते हुए आपसी प्रतिस्पर्द्धा झेलते हुए भी लाभ कमाते हैं.परन्तु यदि उनके व्यापार में घाटा आ जाय,उनके व्यापरिक प्रतिष्ठान में आग लग जाय ,चोरी हो जाय,उद्योग मंदी का शिकार हो जाय तो उनके भविष्य की सुरक्षा के  लिए कोई सरकारी प्रावधान नहीं होता.अक्र्सर निजी व्यवसायी ही लूटमार,चोरी डकैती, अपहरण, रंगदारी जैसी घटनाओं के शिकार होते है.यदि कोई निजी व्यवसायी शरीरिक रूप से(आकस्मिक दुर्घटना,अथवा गंभीर बीमारी के चलते) व्यापार चलाने, उद्योग को चला पाने के योग्य नहीं रहता तो उसे भावी निजी खर्चों के लिए किसी प्रकार के सरकारी योगदान की आशा नहीं होती.

अतः मैं सभी व्यापारी एवं निजी कारोबारियों से निवेदन करता हूँ की वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर आवाज उठायें,और सरकार से अपने हितों की रक्षा के लिए संघर्ष करें ताकि सरकार हमेशा से उपेक्षित निजी व्यवसायी वर्ग की आर्थिक सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठा सकें.(SA-177C)

 

 


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