अपना बर्चस्व बनाने की घातक प्रवृति


             हमारे देश में गत कुछ दशकों में शिक्षा का प्रचार और प्रसार तीव्र गति से बढ़ा है. इस कारण आम व्यक्ति का व्यक्तित्व विकास भी तेजी से हुआ है,उसकी महत्वाकांक्षाएं भी उसी गति से बढ़ी हैं.आज प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को सुविधा संपन्न होकर जीना चाहता है.प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति उच्च जीवन शैली को अपनाने को उत्सुक है,फिर चाहे उसके पास दो समय के लिए रोटी जुटाना भी उसकी सामर्थ्य से परे हो.परन्तु उसके सपने बहुत ऊंचे हो रहे हैं. इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपने परिजनों,संगी साथियों को अपने विचारों ,अपनी इच्छाओं के अनुसार चलाने के लिए उतावला रहता है.अपने बर्चस्व को बनाने के लिए वह अनेक प्रकार के उचित अनुचित उपाय करता है. अपने विचारों को दूसरों पर थोपने के लिए हिंसा से भी परहेज नहीं किया जाता, धार्मिक दंगे इसका जीता जगता उदहारण है.जो अपने धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म के प्रति असहिष्णुता दर्शाती है.आज भी खाड़ी के देशों में उभर रही आतंकवादी शक्ति आईएस का उद्देश्य भी यही है की पूरी दुनिया में इस्लाम धर्म का ही बर्चस्व रहे बाकि सभी धर्मों का अस्तित्व समाप्त हो जाय.

   ऐतिहासिक रूप में अंतर्राष्ट्रीय पटल पर अनेक ऐसे अनेक उदहारण भरे पड़े है, जब एक शक्तिशाली व्यक्ति (हिटलर,सिकंदर) ने पूरी दुनिया को अपने कब्जे में करने का प्रयास किया, उस प्रयास में उसने भयंकर रूप से कत्लेआम मचाया लोगो को अनेक यातनाएं दी उन्हें गाजर मूली की भांति काट डाला या मार डाला.

यदि कोई अधिक धनवान है तो वह अपने धन के बल पर सभी को अपने विचारों के अनुरूप चलने की इच्छा रखता है,यदि कोई उच्च पद पर आसीन है तो वह आम जनता को अपने पैरों की जूती समझता है, यह बात अलग है यदि उससे बड़ा पदाधिकारी उसके समक्ष हो तो उसका व्यव्हार एक दम याचक वाला हो जाता है और बड़ा अधिकारी उसे भी अपने इशारों पर नचाता है. अर्थात सब खेल ताकत का रह गया है.तर्क वितर्क,उचित अनुचित सब पीछे छूट गए लगते हैं.जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहानी चरितार्थ हो रही है.बिलकुल वही स्थिति होती जा रही है जैसे कभी अपराधी प्रवृति के लोगों में ही देखने को मिलता था,जहाँ प्रत्येक बदमाश अपने से अधिक ताकतवर बदमाश के समक्ष नतमस्तक रहता है.परन्तु अपने से कमजोर बदमाश के लिए मौत बना रहता है.

बर्चस्व की बढती प्रवृति कही न कही उसकी घटती सहन शक्ति परिलक्षित करती है.वह अपने से कमजोर व्यक्ति के अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाता जब तक वह उसके बर्चस्व को स्वीकार न कर ले. कोई भी शक्तिशाली(तन, मन, धन किसी भी रूप में)व्यक्ति अपने मित्रों रिश्तेदारों,परिजनों को भी अपनी इच्छानुसार चलाने की इच्छा रखता है.इसी कारण संयुक्त परिवार एकाकी परिवारों में विभक्त होते जा रहे हैं.परिवार में मिल बाँट कर खाने की प्रवृति समाप्त हो रही है.आज प्रत्येक इन्सान अपने स्वार्थ, अपने हितों की बात सोचता है. यदि वह किसी के लिए कुछ कर भी देता है तो उसे अपने कर्तव्य न मान कर उस पर अहसान मान कर उसे अपने इशारों पर चलाने की इच्छा पाल लेता है.यदि वह व्यक्ति उसके इच्छानुसार उसके लिए कार्य नहीं करता तो उसे अहसान फरामोश करार देता है अहसान फरामोश करार देता है.

आज इन्सान अपना अधिपत्य ज़माने के लिए प्रतिस्पर्द्धा में जुट गया है.प्रतिस्पर्द्धा किसी प्रकार से हो सकती है.वह शिक्षा के क्षेत्र में हो,या खेल कूद में अथवा अपने कारोबार में.अपने प्रतिस्पर्द्धी को नीचा दिखाने के लिए वह अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय भी लगा देता है.यानि भले ही उसके जीवन के सुनहरी क्षण चले जाएँ(गुणवत्ता पूर्ण जीवन) परन्तु उसका प्रतिद्वंद्वी नहीं जीतना चाहिए.यदि फिर भी जीत पक्की दिखाई नहीं देती तो हिंसा, बेईमानी, धोखाधडी, करने से भी परहेज नहीं होता. कार्य क्षेत्र कोई भी हो सकता है जैसे दुकानदारी अर्थात व्यापार, कारखाने में उत्पादन कार्य हो या कोई अन्य व्यवसाय हो अथवा राजनीति हो. और यह भी आवश्यक नहीं की व्यक्ति व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वी ही हो आज भाई बहन एवं नजदीकी सम्बन्धी के अपने क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए भी देखना गवारा नहीं होता सिर्फ अपनी उन्नति ही रास आती है क्योंकि उसकी उन्नति से अपना बर्चस्व घट जाता है. जीवन में आगे निकलने की होड़ या अपने बर्चस्व कायम करने की इच्छा इन्सान को अपना स्वाभाविक जीवन(QUALITY LIFE) जीने से वंचित कर देती है.आधुनिक युग में इन्सान ने अपना दिन और रात इसी उधेड़ बुन(प्रतिस्पर्द्धा) में लगा दिया है, जो उसे पहले तनाव देती हैं और फिर अनेक शारीरिक बीमारियाँ लग जाती हैं और अंत में जीवन समाप्त हो जाता है.उसका रॉब,उसका बर्चस्व,उसका अधिपत्य सब कुछ यहीं रह जाता है.

यहाँ पर यह बताना भी प्रासंगिक होगा की यदि कोई व्यक्ति नहीं चाहता की वह अपने से छोटे या अपने संपर्क में आने वाले किसी व्यक्ति को अपने दबाब में रखे,अपने विचार उस पर थोपे,उस स्थिति में उसके अंतर्गत आने वाले लोग उस पर हावी होना प्रारंभ कर देते हैं.उससे छोटे स्तर के लोग या परिजन उसको अपने विचारों से प्रभावित करने का प्रयास करते हैं.यानि की यदि कोई अपना डंडा नहीं चलाना चाहता, तो लोग उसे डंडा लेकर खड़े हो जाते हैं.अजीब दस्तूर है दुनिया का.

 

 

 


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