हम सभी भ्रष्टाचारमय हो चुके हैं


 

     अक्सर भ्रष्टाचार को हम सरकारी कामकाज में व्याप्त, नौकरशाहों और राजनैतिक नेताओं द्वारा लिए जाने वाले घूस या कमीशन को ही भ्रष्टाचार मानते हैं.जबकि भ्रष्टाचार एक व्यापक रूप में हमारी रग रग में समां चुका है.बड़े बड़े व्यापारी भी सरकारी स्तर पर अपने कार्य कराने के लिए सक्षम अधिकारी को अनेक प्रलोभन और रिश्वत देते हैं और अपने इच्छानुसार कार्य कराकर अपने आर्थिक हितों को साधते हैं,और कार्य को तुरत फुरत करवा कर अपना समय भी बचा लेते हैं.यदि कोई अधिकारी ईमानदार है और उनके कार्य में अड़चन डालता है तो उसे अनेक प्रकार से धमकाया जाता है. कभी कभी तो उसे मरवा देने की धमकी भी देते है.अनेक बार ऐसे अनेक अफसर घूस खोरी का विरोध करने पर शहीद हो चुके हैं.जो यह सिद्ध करता है की सरकारी विभागों में रिश्वत खोरी के विरुद्ध आवाज उठाने वाले और अपने कार्य को कानून सम्मत करने वालों को अनेक प्रकार की यातनाये सहनी पड़ती हैं.ऐसे ईमानदार अफसरों को सरकार की ओर से कोई संरक्षण नहीं मिलता.इसी कारण भ्रष्टाचार नित्य प्रतिदिन बढाता जाता है और जनता त्रस्त होती रहती है.भ्रष्ट अफसर अपने बॉस का चहेता भी बना रहता है, क्योंकि उसे भी उसकी अवैध कमाई में हिस्सा मिलता है. ऐसे कर्मियों की पदोन्नति भी शीघ्र होती है.जबकि ईमानदार कर्मी को उसकी ईमानदारी की सजा के रूप में बॉस की प्रताड़ना मिलती है,उसे बार बार स्थानान्तरण(ट्रांसफर) के रूप में कष्ट सहना पड़ता है,भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं इस प्रकार उसका शोषण किया जाता है.

     आज हमें आदत पड़ चुकी है की किसी भी सरकारी कार्यालय में अपने कार्य के लिए जाते हैं, तो सरकारी कर्मी की पूरी चापलूसी करते है और उससे अपेक्षा करते है की वह अपने चाय पानी के पैसे लेकर कार्य को फ़ौरन कर दे और कायदे कानूनों को धता बताकर हमारी मन मुताविक कार्य कर दे. हमें अपने स्वार्थ के आगे कानून या नियम के प्रति प्रतिबद्धता कोई मायने नहीं रखती. और इस प्रकार से हम (आम आदमी)स्वयं भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते है,अर्थात भ्रष्ट आचरण के हम आदि हो गए हैं.अब तो हम वोट भी उसे ही देते हैं जो हमें किसी आर्थिक लाभ का वायदा करता है, अथवा शराब या धन से हमारे वोट की कीमत अदा कर देता है.जब हम रिश्वत लेकर अर्थात धन के लालच से अपना प्रतिनिधि चुनेंगे तो उससे कैसे उम्मीद कर सकते हैं की वह हमें ईमानदार और स्वच्छ प्रशासन देगा?

     हमारी एक आम धारणा बन गयी है की हमें कानून सम्मत तो कोई कार्य करना ही नहीं है हमें कानून का कोई डर नहीं है. अतः कानून तोडना हमारी फितरत में बस चुका है.हमें पता है यदि कोई सरकारी कार्यवाही होती है तो डीलिंग अफसर को रिश्वत दे कर शांत कर देंगे.यानि हमें सरकारी अफसर को तो रिश्वत देना मंजूर है परन्तु कानून सम्मत कार्य करने में आने वाले खर्च को वहन करना स्वीकार्य नहीं है iऔर खर्च न भी होता हो तो भी कानून के अनुसार कार्य क्यों करें?

       अधिक कमाई करने के लिए एक दूसरे को धोखा देना,जालसाजी करना,सब्जबाग दिखाना,मिलावट खोरी करना,नकली माल तैयार करना अथवा व्यापार करना परोक्ष रूप से लूट मार के ही रूप हैं और भ्रष्टाचार का ही स्वरूप है.

आम जनता में व्याप्त भ्रष्टाचार के उदाहरण के निम्न रूप सर्वविदित हैं,

मोटी कमाई के लिए एक डॉक्टर मरीज का अपेन्डिक्स के ओपरेशन का बहाना कर उसकी किडनी,लीवर इत्यादि महत्त्व पूर्ण अंग निकाल कर बेच देता है.

एक इन्जिनियर कमीशन के लिए ठेकेदार को ऊंचे रेट पर टेंडर कर देता है और काम की गुणवत्ता को नजर अंदाज करता है.

वकील मोटी फीस के लालच में अपने गुनाहगार मुवक्किल को बेगुनाह साबित करने के लिए सारे हथकंडे अपनाता है(सबूत गायब कर या गवाह को तोड़ कर या धमका कर) और मुक़दमे में सच्चाई का गला घोंट देता है,कभी कभी तो बेगुनाह को सजा भी करवा देता है.

हम अपना घर तो स्वच्छ रखना चाहते हैं परन्तु सडक पर कचरा डाल कर उसे गन्दा करते रहते हैं,या चुपके से पडोसी के मकान के सामने डाल देते हैं.बस या ट्रेन में सफ़र करते समय साफ सफाई ध्यान रखना अपना फर्ज नहीं समझते.

बिजली के बड़े बिल से बचने के लिए सरकारी कर्मचारी मिल कर मीटर में हेरा फेरी करते हैं और धड़ल्ले से बिना बिल चुकाए बिजली का लापरवाही से उपयोग करते हैं.क्योंकि हमें देश में बिजली की कमी से कोई सरोकार नहीं है.इसी प्रकार से पानी का फिजूल खर्च भी हमें नागवार नहीं करता.पानी हो या बिजली उसका उपयोग(सदुपयोग या दुरूपयोग) करना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है क्योंकि हम देश के बफादार नागरिक हैं

हमारे अंतर्मन में बैठी भ्रष्टाचार की धारणा इतनी गहरा चुकी है की जब सोचते है की मोदी सरकार देश को भ्रष्टाचार मुक्त करेगी तो आम प्रश्न हमारे मस्तिष्क में उठता है क्या हम भ्रष्टाचार मुक्त होकर अपने जीवन को सुचारू रूप से चला पाएंगे.अपने सरकारी कार्यों को करा पाने में सक्षम होंगे? क्या व्यापार और उद्योग चला पाना संभव होगा अथवा कानूनी दांव पेंच में ही फंस कर रह जायेंगे? (SA-173C)


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