क्या वर्तमान दौर में भी तनाव मुक्त जीवन जी पाना संभव है?


वर्तमान भौतिकवादी युग में जहाँ हर स्तर पर गला काट प्रतिस्पर्द्धा हो रही है.प्रत्येक व्यक्ति कम से कम समय में अधिक से अधिक सुख सुविधाएँ जुटा लेना चाहता है,समाज में अपने स्तर को निरंतर ऊंचाइयों पर देखना चाहता है,जो उसे दुनिया की चूहा दौड़ में शामिल होने को मजबूर करता है और इन्सान निरंतर तनाव का शिकार हो रहा है. स्वस्थ्य और सकारात्मक विचारों का स्थान ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लालच, धोकाधडी, हिंसा जैसी दुर्भावनाओं ने ले लिया है जो स्वयं हमें सर्वाधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं,और समाज को छिन्न भिन्न करके रख दिया है. तनाव के कारण अनेक मानसिक रोगों के साथ साथ शरीरिक रोग भी अपना बसेरा डालते जा रहे हैं,जिनमे मुख्य तौर पर मधुमेह, केंसर, उच्च रक्तचाप, थाइरोइड जैसे गंभीर रोग भी शामिल हैं. खान पान, जल वायु सभी कुछ प्रदूषित हो चुका है, रहन सहन में कृत्रिमता आ गयी है,जिसने अनेक प्रकार की शारीरिक व्याधियों को जन्म दिया है.हर समय तनाव में रहने के कारण मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है.आज दुनिया में हर तीसरा व्यक्ति डिप्रेशन अर्थात अवसाद का शिकार हो चुका है.इसके अतिरिक्त भी शरीर में अनेक प्रकार की मानसिक बीमारियाँ बढती जा रही है.बढ़ते भौतिक वाद ने आम व्यक्ति को असुरक्षित कर दिया है उसे हर वक्त चिंता रहती है की आज जो काम वह कर रहा है उसका भविष्य क्या होगा?क्या यह कार्य उसे भविष्य में भी इतने ही साधन प्रदान करता रहेगा जो आज दे रहा है? कब उसका जीवन स्तर वर्तमान जीवन स्तर से नीचे आ जायेगा? यह प्रश्न भी तीन चौथाई लोगों के असंतोष का कारण बनता जा रहा है.नित्य समाज में अनेक प्रकार के संघर्ष को देखना पड़ता है.रिश्ते नातेदार भी एक दूसरे के लिए संवेदनहीन होते जा रहे हैं, हर तरफ षड्यंत्र की बू आने लगी है.सब एक दूसरे को नीचा दिखने तो तत्पर हो रहे हैं.अपनी उन्नति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं.ऐसे वातावरण में कोई भी अपने मन को शांत कैसे रख सकता है.
आज हम भौतिक सुख सुविधाएँ जुटा कर ख़ुशी ढूँढने का प्रयास करते हैं.क्या भौतिक वस्तुओं से प्राप्त ख़ुशी स्थायी होती है.सभी भौतिक वस्तुओं से हमें जो ख़ुशी प्राप्त होती है वह क्षणिक होती है.मेरा कहने का तात्पर्य है मान लीजिये आपने घर में नया टी वी लिया है जो बिलकुल नयी तकनिकी के अनुसार तैयार किया हुआ है निश्चित ही घर में ख़ुशी का माहौल बनेगा, या नयी कार खरीद लेते हैं तो अवश्य ही कुछ दिनों तक हमें अत्यंत ख़ुशी का अहसास होगा, तत्पश्चात यह ख़ुशी सामान्य व्यव्हार में आ जाएगी और हमारा उत्साह भी समाप्त हो जायेगा. इसी प्रकार से अन्य खुशियाँ भी समय के साथ विलुप्त हो जाती हैं.कभी कभी तो सारी खुशिया प्राप्त करके भी हमें बोरियत होने लगती है.यही वजह है सर्व साधन संपन्न व्यक्ति भी अवसाद का शिकार होते रहते हैं यदि भौतिक सुखो से ख़ुशी प्राप्त होती तो धनाड्य व्यक्ति कभी आत्महत्या नहीं करते और गरीब लोग कभी खुश नहीं रह पाते.गरीब लोग भी समय समय पर प्रसन्नता परिलक्षित करते हैं कुछ गरीब तो अपनी स्थिति से पूर्णतयः संतुष्ट देखे जा सकते हैं.इससे सिद्ध होता है विलासिता पूर्ण जीवन या भौतिक वस्तुएं ख़ुशी का स्थायी माध्यम नहीं हैं.असली ख़ुशी हमारे अंतर्मन में होती है, यदि हम अपने मन में सकारात्मक विचारों को पनपने का अवसर दे और निगेटिव विचारों को मन में न आने दें या मन में बैठे निगेटिव विचारों को निकल पायें, तो हम हर हाल में खुश रह सकते हैं और अपने सभी कार्य पूरी शक्ति से अधिक सक्षमता के साथ कर सकते हैं.
1,पराधीन ख़ुशी;-
हमें लगता है जब हमारे परिजन अर्थात बेटा बेटी, माता पिता या भाई बहन खुश होंगे तो हम भी खुश हो जायेंगे.यानि की हमारी ख़ुशी परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भर हो जाती है. हम वही कार्य करने का प्रयास करते हैं जिससे हमारे प्रियजन खुश हो जाएँ,महिला बढ़िया भोजन इसलिए बनती है ताकि सब खुश होकर उसकी तारीफ करेंगे और वह खुश हो जाएगी,बच्चे इसलिए पढाई करते हैं जिससे उसके बड़े उनसे खुश रहे वे उन्हें डाटें नहीं. परिवार का मुखिया अधिक से अधिक धन एकत्र कर परिवार के लिए सुविधाएँ जुटाने का प्रयास करता ताकि परिवार के सभी सदस्य खुश रहें, तो वह भी खुश होगा.अर्थात हम जो कार्य करते हैं वह परिवार के सदस्यों को खुश देखने के लिए,कोई भी कार्य अपनी ख़ुशी के लिए नहीं करते यदि आपके कार्य से परिवार के लोग संतुष्ट नहीं होते तो आप भी दुखी हो जाते हैं और आपकी कार्य क्षमता घट जाती है,आपका उत्साह ठंडा हो जाता है
2, सुख और दुःख में तटस्थ जीवन,

अक्सर हम भौतिक सुख और दुखों से सुख और दुःख का अनुभव करते हैं.यदि कोई अपना परिजन या मित्र विपदा में होता है बीमार होता है तो हम अपना मानसिक संतुलन iखो बैठते हैं.अर्थात अत्यंत दुखी हो जाते हैं जो हमारे शरीर की ऊर्जा को नष्ट कर देता है हम कमजोर पड़ जाते हैं. कभीi कभी तो इतनी हिम्मत भी नहीं रहती की उस बीमार या आपदा ग्रस्त व्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार उसकी सहायता कर सकें, उसे उचित चिकित्सा दिला सकें.हमारा उसके प्रति लगाव तो उचित है परन्तु यदि हम स्वयं भी उसकी स्थिति तो देख कर विचलित हो जाते हैं, आत्म नियंत्रण खो बैठते हैं, तो हमारी मनः स्थिति उसके लिए हानिकारक हो सकती है. अतः दुखी होना स्वाभाविक है परन्तु अपने मन को विचलित कर देना हानिकारक हो सकता है.हमारे अन्दर ऊर्जा बनी रहेगी तो हम विपदा ग्रस्त मित्र या परिजन की सहायता कर पाएंगे और उसे स्वास्थ्य लाभ के अवसर आसानी से दे सकेंगे. अतः सुख और दुःख को अस्थायी मान कर मन को स्थिर रखने का प्रयास करना चाहिए, सुख में अत्यधिक खुश होना और दुःख में अपना मानसिक संतुलन खो देना या विचलित हो जाना स्वयं के लिए,परिवार के लिए और समाज के लिए भी हानिकारक है.किसी भी विपदा का सामना धैर्यता और साहस से ही किया जा सकता है और विपदा के समय साहस और धैर्यता जुटाने लिए शरीर को शक्ति की आवश्यकता होती है.यह भी समझना आवश्यक है की किसी भी विपदा से निकलने के लिए हम अपनी शक्ति से ही यथा संभव निकलने की चेष्टा कर सकते है.यदि परिस्थितियों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है तो उसके लिए परेशान होने से कोई हित होने वाला नहीं है.शांत मन से ही समस्या का समाधान खोजा जा सकता है,मन को स्थिर रख कर ही हम परिस्थितियों पर नियंत्रण रखने का प्रयास कर सकते हैं, जिसके लिए शारीरिक और मानसिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है.
उपरोक्त कथन का यही तात्पर्य है की हमें स्वास्थ्य एवं सुखी जीवन जीने के लिए आत्म नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक है.अपनी भावनाओं और आवेगों अर्थात क्रोध, इर्ष्या, द्वेष, साजिश, प्रतिद्वाद्विता इत्यादि पर विजय पानी होगी,ताकि हमारी कार्यक्षमता बनी रहे ,और तनाव ग्रस्त जीवन से मुक्ति मिल सके.(SA-166C)


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