क्रोध और अभिमान


दुनिया कोई व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता जिसे कभी भी क्रोध न आता हो. क्रोध इन्सान की एक भावावेश अभिव्यक्ति है, हँसना, रोना, क्रोध करना, इन्सान की मनोस्थिति का परिणाम है. क्रोध का भाव आने के भी अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे शारीरिक व्याधियां,मानसिक व्याधियां,या प्रतिकूल अथवा विषम परिस्थितियां इत्यादि. आधुनिक भौतिकवादी युग में इन्सान जहाँ दिन रात भागदौड में लगा रहता है,अनेक प्रतिस्पर्द्धाओं का सामना करता है,अनेक बार तनाव का शिकार होता है,जो अक्सर उसके क्रोध के रूप में परिलक्षित होता है और इस प्रकार से आने वाले क्रोध को परिस्थितिजन्य क्रोध की संज्ञा दी जा सकती है.इसी प्रकार शरीरिक या मानसिक रोगों से त्रस्त व्यक्ति भी अनेक बार क्रोध का शिकार होता है.इन स्थितियों में आने वाले क्रोध को मानव की स्वाभाविक क्रिया माना जा सकता है, जिसमें मानव अपने आप को नियंत्रित नहीं कर पाता.
एक क्रोध बनावटी भी होता है जो सामने वाले को अपमानित करने के लिए किया जाता है, इस क्रोध के पीछे अनेक कुटिल इरादे छिपे होते हैं, जैसे सामने वाले को लज्जित करना, अपने गुनाह को छुपाने के इरादे से हावी होना, सामने वाले को स्वतंत्रता पूर्वक अपने विचारों को अभिव्यक्त करने से रोकना, अपने अधीनस्थ को नियंत्रित करने के लिए रौब मारना, या गुंडा गर्दी का मकसद हल करने के लिए सामने वाले को भय भीत करने के लिए नाटक करना. इस प्रकार से क्रोध को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.और इस प्रकार से किये गए क्रोध में व्यक्ति के पद, धन दौलत, बुद्धि मत्ता ,शारीरिक या सामाजिक ताकत का अभिमान झलकता है. ऐसे व्यक्ति को अभिमानी कहना अनुचित न होगा. पद,प्रतिष्ठा,दौलत,बुद्धिमत्ता,सामाजिक या शारीरिक ताकत का एक नशा होता है जिसे प्रत्येक व्यक्ति सम्हाल नहीं पाता और वह अपनी योग्यता या सामर्थ्य के जोश में होश खो बैठता है.अक्सर वह जमीनी हकीकत को झुठला देता है और वह असफल,निर्धन,अल्पशिक्षित व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखता है. ऐसा व्यक्ति अपनी सफलता, अपनी दौलत या सामाजिक रुतबे को सिर्फ अपने परिश्रम का परिणाम मानता है.यह बात तो कटु सत्य है की बिना परिश्रम ,बिना लगन के कोई भी सफलता मिलना असंभव है,पर बहुत लोग ऐसे भी होते हैं जिन्होंने अथाह परिश्रम किया होता है, pपरन्तु नसीब ने उनका साथ नहीं दिया और वह यथा योग्य सफलता प्राप्त नहीं कर सका या असफल हो जाता है जबकि उनकी योग्यता किसी भी सफल व्यक्ति से कम नहीं होती.अतः किसी भी व्यक्ति की योग्यता को कम आंकना सदैव उचित नहीं होता.प्रत्येक व्यक्ति को अपने आत्मसम्मान की चाह होती है अपमानित होना किसी को भी स्वीकार्य नहीं होता.वैसे भी किसी भी महनत काश इन्सान को जो इमानदारी से पाने कर्तव्यों को निर्वहन करता है सम्मान का पात्र है.छोटे पद पर होना कम धनवान होना या निर्धन होना उसके अपमान का कारण नहीं होना चाहिए.अपमान का पात्र वो है जिसने अनैतिक तरीके से धन अर्जन किया है,धिक्कार का पात्र वह है जो गैर कानूनी कार्यों को अंजाम देता है,दौलत कमाने के लिए हिंसा,शोषण,अपराध धोखा धडी जैसे हथियारों का इस्तेमाल करता है.
इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं जिन्हें शोहरत या दौलत पैत्रिक संपत्ति के रूप में प्राप्त हो गयी हो उनके लिए धन अर्जन का कोई महत्त्व नहीं होता, ऐसे लोगों के लिए किसी भी कम धनवान गरीब या अपेक्षतया कम स्तरीय कार्यों में लिप्त व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं होता.इस प्रकार के व्यक्ति अक्सर घमंडी होते हैं और हर व्यक्ति का अपमान करना उन पर क्रोध करना इनकी फितरत में शामिल होता है.
यदि प्रत्येक व्यक्ति यह सोच कर की यह जीवन,यह धन दौलत या प्रतिष्ठा कुछ भी स्थायी नहीं है,सब कुछ क्षण भंगुर है तो उसका किसी का भी अपमान करना उस पर क्रोध करना,किसी का दिल दुखाना उसके लिए उचित नहीं है,तो यह दुनिया अनेक कष्टों से मुक्त हो सकती है.हमें अपनी सफलता को अपना सौभाग्य समझना चाहिए न की किसी अन्य का दुर्भाग्य.सबका सम्मान करना ही उसका बड़प्पन है,अपने से किसी का हित साधन करना ही सफलता का द्योतक है.कोई भी असफल व्यक्ति या गरीब व्यक्ति पहले से ही अभिशप्त है उसका अपमान,या निरादर क्यों?(SA-148B)


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