​​अहंकार (अहम् ) वृद्धावस्था का अभिशाप


अहम् अर्थात अहंकार या कहें आत्म स्वाभिमान , किसी भी प्रकार से हो सकता है .संसार में प्रत्येक व्यक्ति में अहम् भाव का होना एक स्वाभाविक प्रवृति है .यहाँ तक की भिखारी भी अपने बच्चों एवं पत्नी से व्यव्हार करते समय अपने अहम् भाव को प्रकट करता है .क्योंकि उसमें अहम् होता है एक पिता होने का या पति होने का .इसी प्रकार किसी को अपनी दौलत का अभिमान होता है , तो किसी को अपनी बुद्धिमत्ता का अहंकार होता है कोई उच्चाधिकारी अपने पद के नशे में चूर होता है तो कोई अपनी शारीरिक ताकत पर इतराता है ,कोई उच्च जाति से सम्बंधित होने के कारण अहंकारी होता है |अहम् भाव रखना ,अपने को गौरवान्वित अनुभव करना अपने उच्च स्तर के लिए गौरव का अनुभव करना कोई दुर्गुण नहीं है,बल्कि यह भावआत्म संतुष्टि का कारण बनता है, परन्तु जब यही अहम् या अहंकार किसी को नीचा दिखाने या किसी का अपमान करने में इस्तेमाल होने लगे तो आपके लिए और समाज के लिए कष्टकारी भी बन जाता है| आपकी शालीनता को ख़त्म कर देता है| आपके व्यव्हार से आपके परिजन भी भयभीत हो सकते हैं जो कालांतर में आपकी वृद्धावस्था के लिए अभिशाप भी बन सकता है| जीवन क्षण भंगुर होता है,पता नहीं कब खत्म हो जाये, यदि मौत को ध्यान में रखा जाय, सबका अंत एक ही है तो अहंकार कैसा ? अतः अपने जीवन में किसी को आहत क्यों किया जाय? सबसे समान व्यव्हार, सम्मान जनक व्यवहार, मधुर व्यव्हार ही श्रेष्ठ है
वृद्धावस्था में प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक , आर्थिक ,मानसिक रूप से परिजनों पर आश्रित होना ही पड़ता है .उस समय आपका मधुर व्यव्हार ही आपको शांति प्रदान कर सकता है| जो लोग अपने कार्यकाल में उच्च पदों पर आसीन रहे हैं ,या बहुत बड़े व्यापारी ,कारोबारी ,व्यवसायी रहे हैं उसकी ठसक अपने परिजनों पर अपनाते रहे हैं,अपने अहम् भाव के कारण उन्हें आहत करते रहे हैं तो निश्चित रूप से आपको वृद्धावस्था के लिए अपने स्वभाव में बदलाव लाने की आवश्यकता है| क्योंकिपूर्व की भांति आपको मान सम्मान इस अवस्था मेंमिलने वाला नहीं है| अतः परिजनों की उपेक्षाआपके अहम् पर चोट कर सकती है,आपको क्रोधित कर सकती है . यही क्रोध आपके लिए अभिशाप भी बन सकता है वृद्धावस्था में धन दौलत का रौब दिखाना ,अपने अतीत में रहे उच्च पद की शान का बयान करना ,अपने से छोटे को नीचा दिखाना ,या उसको उसकी औकात का अहसास करानासंतान को अन्य लोगों के समक्ष अपमानित करना ,जलील करना ,कुतर्कों द्वारा अपने बर्चस्व को बनाय रखने के प्रयास करना , आपकी जीवन संध्या को कष्टकारी बना सकता है| आज के परिवारों में बुजुर्गों को सामंजस्य बैठा पाने में यही अहम् भाव आड़े आता है|

अतः यदि आप वृद्धावस्था के करीब हैं तो अभी से अपने अहम् को त्यागने के प्रयासकरने होंगे . ताकि आपकी वृद्धावस्था तनाव रहित शांति प्रिय हो सके और परिवार का वातावरण स्नेह ,सम्मान उदारता , एवं शांति से भरपूर हो सके | परिवार में सुख और शांति का वास हो सके |

सत्य शील अग्रवाल
Blogger:-www.satyasheelagrawal.jagranjunction.com
http://www.satyasheel.blogspot.com
लेखक:–बागड़ी बाबा और इंसानियत का धर्म
जीवन संध्या (भारतीय बुजुर्गों की समस्याओं पर आधारित)


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